पेश है आपकी ही बात
आपके ही शब्दो में विजय खनगवाल की रचना
आ ,तेरी दीवानी
कलम से तुझे
मिला दूँ कभी |
आ बैठ पास
, है इश्क कितना
गहरा बतियादु कभी
||
चाँद तारे क्यों
तोडना,चल वही
ले चलूँ |
तन्हा आसमां से
बातें करना सिखला
दू कभी ||
तेरा सिर मेरी
गोदी किसी सागर
की रेत पर
|
बैठें यूँही
दूर अँधेरे के
चमकते दिये गिना
दू कभी ||
दिल - ए- खुश
सा मीठा कहां
कुछ है
|
खुद को घोल
तुझ में , कहो
तो स्वाद बढ़ा
दू कभी ||
चल 'जय' इशारो
में बतियाना सिखला
दू कभी ॥
@विजय खनगवाल
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लाजवाब।
ReplyDeleteशब्दों का बेहतरीन प्रयोग।
Thanks sir
DeleteNice lines
ReplyDeleteThanks For your love
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